एक कप कॉफी By Zafar September 14, 2007 कही किसी रोज़ हम मिलेंगे याद आएँगी तब पुरानी बातें कुछ खट्टी कुछ मीठी हँसी जैसी कुछ किताबें खुलने लगेंगी सामने कुछ अनकही कुछ अनसुनी चंचल हिरनियों जैसी कुछ यादें कुछ लम्हों का यह सफ़र कुछ लम्हों में जीकर हम कहेंगे आपसे, 'एक कप कॉफी हो जाए?!' Read more